'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

by Mahesh Vallabh Pandey 'ऐ दर्द!'
Season 1

8. S01 - E08 जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के!🤺

हर रोज़ हम अपने अपने घर से निकलते हैं, जिंदगी की उस जंग में शामिल होने!😀 -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के! -ख़ाक में मिल जाए, या सर क़लम हो जाए चाहे, कुछ तो कर गुजरेंगे हम, बिना सिपहसालार के! -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के! -ताज मेरे दुश्मनों का, सज नहीं सकता है क्या? न सोच ग़ुरबत दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के! -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के! -क्यूँ है हसरत सर्द तेरी, क्यूँ कलेजा गर्द है, होता है ये गर तू निकले, बिना सिपहसालार के! -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के! -हुक्मरानों ने कहा, तू चीज़ क्या, औकात क्या, सोचा कह दूं, पर नहीं, बिना सिपहसालार के! -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के! -'ऐ दर्द', शर्बत में मिला कर अम्ल दे देते हैं लोग, बर्बाद हैं जो लड़ पड़ें, बिना सिपहसालार के! -जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के, जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के, आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए, अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!

7. S01 - E07 इज़ादे तहजी़ब करने वाले, बद्जुबानी के शहनशाह!👌

ये पूरी कायनात, एक ऐसे फरेब़ पर चल रही है की जिसे, समझना तो दूर, गिरफ़्त में लाने को कोई कायदा ही नहीं है!👌 -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह! -अश्क बहते ही चले, कोई तो रोको इन्हें, ईज़ाद-ए-हसीं करने वाले, बदगुज़ारी के शहंशाह! -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह! -उस्तादों से जब हम मिले, रश्क़ था अपने ऊपर, ईज़ाद-ए-कुश्ती करने वाले, बदहवासी के शहंशाह! -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह! -आदाब, सलाम, अर्ज है, हुजूर, बेगम, कमजर्फ़, ईज़ाद-ए-तमीज करने वाले, बदतमीज़ी के शहंशाह! -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह! -आगे, पीछे और आज लगता है सब एक सा, ईज़ाद-ए-तारीख़ करने वाले, बदशुमारी के शहंशाह! -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह! -'ऐ दर्द' ये कैसा जूलूस है, देख कैसा है हुजूम, ईज़ाद-ए-हमाम करने वाले, बदनहाने के शहंशाह! -ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह, ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह, न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां, ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!

6. S01 - E06 इतनी गुरब़त में मुस्कुराना हुनर है!🙏

क्या आपको चारों तरफ गुरब़त ही गुरब़त नज़र आती है दोस्तों? क्या आप भी ऐसी गुरब़त में रहना चाहते हैं?🤞 -इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -देखते ही देखते, दिल में हुए कई छेद, उस पर भी दिल का कसमसाना, हुनर है! -इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -जो रात में हुई, वो बात नाबात थी, सुबह हुई, फिर वही बात बताना, हुनर है! इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -आपसे मुख़र हुए, जो इतनी उमर के बाद, वो नजरों का अब भी झुक जाना, हुनर है! इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -वादा करना, मुस्कुरा के, फिर नज़र आना नहीं, उसपर भी छोड़ देना ठिकाना, हुनर है! इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -नामचीनों में शुमार, आपका ख़ानाख़ाना, नजर न आए ख़ानसामा, हुनर है! इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है! -'ऐ दर्द' तूने अपने पास, रखी थी जो रहगुज़र, उसपर अकेले ही चलते जाना, हुनर है! इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है, पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है, क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को, हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!

5. S01 - E05 ना हो परेशां, इस शहर से नादां! 🙏

इंसान कुदरती, परेशानियों में रहने का आदी है; परेशानियां ना हों, तो लगता है, जिंदगी ठहर सी गई है!🙏 -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए! -वो तेरा शहर पुराना, भीड़ में भी है अकेला, क्या पता तेरी पनाहों को यहाँ, महफ़िल मिल जाए! -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए! -जिंदगी के चंद लम्हे, दे दे इस मांजर को भी, कि जब कभी गुजरे यहाँ से, सांस तेरी मिल जाए! -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए! -मत सोच क्यूँ कमजर्फ़ हैं सब, क्यूं सभी बेनूर हैं, वक्त इतना है कहाँ, कि सबके जवाब मिल जाएं! -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए! -मत सोच खुद को अजनबी, इस शहर में तब तलक, जब तलक कोई दूजा, अजनबी न मिल जाए! -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए! -इंसान जो कुछ चाहता है 'ऐ दर्द', मिलता है किसको कहां, इसलि ऐ आशना, सब ठीक है जो मिल जाए! -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां, ना जाने कहां सुकूं मिल जाए, न जाने कहां मंजिल हो तेरी, या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

4. S01 - E04 दोस्तों, आपका स्वागत, एहतराम है मेरे इस नए घर में! 🥰

आई कुछ बातें करते हैं; कुछ एक-दूसरे की सुनते, और कुछ अपनी सुनाते हैं!🤗 -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात, एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात, यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों, पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात! -छोड़ दें कुछ देर को, अपनी बेईमानी लतें, मुस्कुरा कर ढायें क़हर, हर किसी पर, तो है बात! -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात, एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात, यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों, पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात! -तालीम है, वक़्त है और हुनर भी साथ है, इस आशियां को बनाएं हम शहर, तो है बात! -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात, एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात, यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों, पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात! -गम नहीं गर ख्वाब पूरे नहीं हो सकते तो क्या, मंजिल-ए-हासिल में छोड़ें, न कोई कसर तो है बात! -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात, एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात, यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों, पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात! -है यक़ीन, ना था यकीन, कि यूं ही मिल जाओगे तुम, खैर, मिलते जो रहो दोबारा, तो है बात! -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात, एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात, यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों, पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

3. S01 - E03 लगभग तीस साल की होने जा रहीं थीं मेरी डायरियॉं!🥰

इ्न्हें पाल-पोस के बड़ा करना कोई मज़ाक की बात नहीं थी; अपने डैडी, मम्मी, भाईयों और बहनों से छुपते-छुपाते लिखी गईं थीं ये डाएरियॉं!🥰 -मेरी हर किताब का मसला एक है, आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है! -ग़म नहीं मुझे, मिले हर दौर में सज़ा, जानता हूं मैं कि मेरा काम नेक है! -मेरी हर किताब का मसला एक है, आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है! -सोचता रहा हमेशा, कभी तो वक्त आएगा, और कहेगा, कि लिजिये, हालात पेश है! -मेरी हर किताब का मसला एक है, ​​आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है! -सिसकिओं से भर लिया कूचा-ए-दिल तमाम, समझे वो कि दीवानों की, यही एक जेब है! -मेरी हर किताब का मसला एक है, आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है! -हम फ़ना होते ही समझे जिंदगी है क्या, हर समंदर के तले होती रेत है! -मेरी हर किताब का मसला एक है, आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है! -मैं क्यूँ डरता हूं जमाने से, समझ में आ गया, मैं अकेला हूं खड़ा, पर वो एक है! -मेरी हर किताब का मसला एक है, आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

2. S01 - E02 आज मैंने अपनी ऐसी ही कुछ डायरियॉं निकालीं आलमारी से! 😊

जब मैं उनको निकालने गया, तो एक शेल्फ में सारी की सारी आराम से सो रहीं थीं; दराज़ के खुलने की आवाज़ सुनते ही, दो तीन डायरियों ने तो करवट बदल के मुझे देखा और मुस्कुराईं!😊 -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -मुझको भी हंसी आती है, जब देखता हूँ आईना, न चेहरा बना, न चेहरा छुपा, कि मैं भी तेरे जैसा हूं! -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -इस रंगदारी में कई, कितने हुनर सीखे नहीं, इंसान हूं, मौला नहीं, कि मैं भी तेरे जैसा हूं! -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -कई शामें मैंने काटीं हैं, अपने उन जज़्बातों के साथ, फ़क्र हुआ ये जान के, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -हासिल नहीं, तो दर-ब-दर, जाता रहा मैं हर गज़र, हासिल नहीं, मुमकिन नहीं, कि मैं भी तेरे जैसा हूं! -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ! -'ऐ दर्द' उठते बैठते, कोई गिला तो कर जिंदगी से, बंद कर दे वर्ना ये कहना, कि मैं भी तेरे जैसा हूं! -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ, मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है, न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

1. S01 - E01 यादें सिमटतीं हैं ऐसे, कि जैसे झुलसीं हुईं हैं!🤗

🤗क्या आपने कभी डायरी लिखी है दोस्तों? क्या आपने कभी अपनी यादों को किसी डायरी के पन्नों में छुपा के रखा है? -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है! -हमें न उससे कोई गिला, न एहतराम कोई, वो भी हमसे नाखुश, और न कोई खुशी सी है! -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है! -आग़ाज़ न कर पाए, तो एक ख़लिश सी रही, न मेहमां ही मिला, और ख़ुश्क ज़मीन सी है! -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है! -फ़रोख़्त का हिसाब क्या रखना, जब की उनकी बाबत, ना बाज़ार में दिखी, ना नज़र में वो ही है! -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है! -उम्दा फासाना, उम्दी जुबान, उम्दा तराना, मेरी जवानी बे-आबरू, बहुत बड़ी सी है! -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है! -'ऐ दर्द', मुनव्वर सा है तेरा ठिकाना. बस कमी इसमें, कुछ चांद सितारों की है! -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है, किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है, खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने, मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

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