'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

di Mahesh Vallabh Pandey 'ऐ दर्द!'
Stagione 2

16. S02 - E06 वो सफ़र न ख्या़लों में गुज़रा🧳

अफ़सोस, न बातों, न अदाओं में गुज़रा 🎭

15. S02 - E05 जब भी निकलें हैं हम सफर के लिए!🙂

ए मेरे आश्नाओं! तीन दिन पहले, मेरा एक मित्र इस जहॉं से चला गया !😢

14. S02 - E04 जिन दरख्तों पर कभी, मैंने बनाया था किला🌴

मेरे पाक रेहनुमाओं, आज मैं अपनी डायरी के चौदहव्वें पन्ने को खोल कर बैठा हूं📜

13. S02 - E03 किसको बला कहें यहॉं, किसको खुदा कहें!🤔

जिंदगी इतनी खूबसूरत है की हर एक पल में दो पहलू होते हैं!💕

12. S02 - E02 बादशाह कहता है कि कर दो हर सर कलम!😡

आजकल कुछ मुल्क़ और कुछ इंसान अपनी बादशाहियत बनाए रखने के लिए, इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं😲

11. S02 - E01 दोस्तों, 'वाह! ये डाएरीयॉं' के सीज़न-२ में आपका तहे दिल से स्वागत है!🤩

अगर किसी एक दिन, वो नूर किसीको बिना बतायें कहीं चला जाए, तो उस मोहल्ले के बाशिंदे क्या सोचते और करते होंगे?😜

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Stagione 1

10. S01 - E10 ए हिज्र के गज़र, तेरा कोई नाम ना लेता!😍

कभी ऐसा हुआ है आपके साथ, की जब ग़म-ए-जुदाई इतनी ज्यादा हो गई हो, की आपको, जमीन के दो टुकड़े करने का दिल करे!😇 -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -दूर हैं वो, ना जाने अब किस हाल में होंगे, गर पास होते तो उन्हें, सीने से लगा लेता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -कब्र ने मुझसे कहा, कि माफ़ कर देना मुझे, गर बस में होता मेरे, तो दोनों को जगह देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -बस कसक सी, दौर-ए-जाम, और एक तन्हा रात है, ऐसे आलम में मुझे, और क्या खुदा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -पूछता हूं, हर किसी से, क्या इश्क यही है, ऐसा सुरूर है जो, क्या खाक नशा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -वो ना जाने मुझसे जुदा होकर भी क्यों चुप हैं 'ए दर्द', मैं जो होता जगह उनकी, जहाँ में आग लगा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता, मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता, न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में, न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!

9. S01 - E09 कल मेरी, मेरे मुकद्दर से मुलाकात हो गई!☺️

मुकद्दर है ऐसा हसी़न, की कब क्या कर दे, कुछ पता ही नहीं!🥰 -कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई, चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई, वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं, जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई! -मुझको यक़ीं था हर गज़र, पर मेरे मुकद्दर को नहीं, मैंने छूने की कोशिश जो की, मेरी सारी क़ायनात हो गई! -कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई, चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई, वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं, जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई! -जुगनूओं के बीच में रहोगे तो खत्म हो जाओगे, फिर न कहना, मेरी क्या औकात हो गई! -कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई, चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई, वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं, जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई! -जब शगुन के पन्ने पलटे, कुछ सूखे से पत्ते मिले, न जाने कब ज़िल्द उसकी, वारदात हो गई! -कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई, चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई, वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं, जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई! -ऐ दर्द' नक़्श उलझे, अक्स सुलझे, कैसी कयामत, कैसा सफ़र, एक अरसा गुज़र चुका क्या? सरकार की क्या जात हो गई! -कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई, चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई, वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं, जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
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