5. S01 - E05 ना हो परेशां, इस शहर...

5. S01 - E05 ना हो परेशां, इस शहर से नादां! 🙏

'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐ... por Mahesh Vallabh Pandey 'ऐ दर्द!'
T1 · E5
29 mar 2022
05:22

Notas del episodio

इंसान कुदरती, परेशानियों में रहने का आदी है; परेशानियां ना हों, तो लगता है, जिंदगी ठहर सी गई है!🙏

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

-वो तेरा शहर पुराना, भीड़ में भी है अकेला,

क्या पता तेरी पनाहों को यहाँ, महफ़िल मिल जाए!

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

-जिंदगी के चंद लम्हे, दे दे इस मांजर को भी,

कि जब कभी गुजरे यहाँ से, सांस तेरी मिल जाए!

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

-मत सोच क्यूँ कमजर्फ़ हैं सब, क्यूं सभी बेनूर हैं,

वक्त इतना है कहाँ, कि सबके जवाब मिल जाएं!

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

-मत सोच खुद को अजनबी, इस शहर में तब तलक,

जब तलक कोई दूजा, अजनबी न मिल जाए!

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

-इंसान जो कुछ चाहता है 'ऐ दर्द', मिलता है किसको कहां,

इसलि ऐ आशना, सब ठीक है जो मिल जाए!

-न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!