भागवत-धर्म तत्त्व को कौन समझ सकता है ? | ब्रजसुंदर दास
इन सर्विस ओफ़ श्रीमद्भागवतम™ di INSS Productions
Note sull'episodio
भागवत धर्म का अर्थ है अपने भीतर के चेतन तत्व को जानना, मानना और दर्शन करना। अर्थात अपने आप के बारे में जानना या आत्मप्रज्ञ होना। गीता के आठवें अध्याय में अपने स्वरूप अर्थात जीवात्मा को अध्यात्म कहा गया है। आत्मा परमात्मा का अंश है, यह तो सर्वविदित है। जब इस संबंध में शंका या संशय, अविश्वास की स्थिति अधिक क्रियामान होती है तभी हमारी दूरी बढ़ती जाती है और हम विभिन्न रूपों से अपने को सफल बनाने का निरर्थक प्रयास करते रहते हैं इसका परिणाम नकारात्मक ही होता है।
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