
Notas del episodio
कभी ऐसा हुआ है आपके साथ, की जब ग़म-ए-जुदाई इतनी ज्यादा हो गई हो, की आपको, जमीन के दो टुकड़े करने का दिल करे!😇
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-दूर हैं वो, ना जाने अब किस हाल में होंगे,
गर पास होते तो उन्हें, सीने से लगा लेता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-कब्र ने मुझसे कहा, कि माफ़ कर देना मुझे,
गर बस में होता मेरे, तो दोनों को जगह देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-बस कसक सी, दौर-ए-जाम, और एक तन्हा रात है,
ऐसे आलम में मुझे, और क्या खुदा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-पूछता हूं, हर किसी से, क्या इश्क यही है,
ऐसा सुरूर है जो, क्या खाक नशा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-वो ना जाने मुझसे जुदा होकर भी क्यों चुप हैं 'ए दर्द',
मैं जो होता जगह उनकी, जहाँ में आग लगा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
