

इन्द्रियों से परे - मृत्यु के भय का अंत | Uttishthata Jagrata
कठोपनिषद: मृत्यु के पार का रहस्य | Katha Upanishad - The Ult... por omtatva
E5
11 may 2026
13:42
Notas del episodio
यह एपिसोड हमें बाहरी दुनिया से हटाकर हमारे सबसे भीतर की ओर ले जाता है । इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि, और बुद्धि से परे महान आत्मा है । आत्मा परमाणु से भी सूक्ष्म और ब्रह्मांड से भी विशाल है । यमराज इसी एपिसोड में प्रसिद्ध आह्वान करते हैं—"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" (उठो, जागो और श्रेष्ठ गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करो) । यह मार्ग उस्तरे की धार के समान कठिन है । जब मनुष्य जान लेता है कि आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न कभी मरती है, तो मृत्यु का भय हमेशा के लिए विलीन हो जाता है । मृत्यु शरीर की होती है, आपकी नहीं ।
Palabras clave
Chariot metaphor Katha Upanishad mind and senses control soul intellect mind