Notas del episodio
भरतजी के मन में था एक प्रश्न — "संत कौन? और असंत कौन?"
हनुमान जी ने उनके भाव प्रभु श्रीराम तक पहुँचाए, और श्रीराम ने इस अवसर पर भक्त, संत और पापी के लक्षणों का ऐसा दिव्य विवेचन किया, जो केवल राम के श्रीमुख से ही सम्भव है।
दोहा 36-42 में वर्णित इस संवाद को सुनकर नारदजी, ब्रह्माजी, सनकादि तक मंत्रमुग्ध हो गए।
📖 जानिए:
भरतजी का विनम्र प्रश्न
संतों के लक्षण और आदर्श आचरण
असंतों की पहचान और उनसे बचने की चेतावनी
रामनाम की महिमा
🌿यह रामचरितमानस का वह अंश है जो हमें धर्म, विवेक और सही संगति की राह दिखाता है।
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